जीव ही जीव की रक्षा करता है : आचार्यश्री

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विदिशा। परस्पर ग्रहों जीवानाम् अर्थात जीव ही जीव की रक्षा करता है। यह सूत्र पूर्व आचार्य महाराज ने जैन धर्म की विशेषता बताते हुए दिया है। हम भगवान की उपासना क्यों करते हैं, उनके गुणों को पाकर उन जैसा बनने के लिए और उन गुणों को पाने के लिए साधु पद की आवश्यकता होती है। आप लोगों का साधु पद देकर हमने कोई उपकार नहीं किया।
उक्त उदगार संत शिरामणी आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ने शीतलधाम पर आयोजित 24 मुनिराजों के प्रथम दीक्षा दिवस पर आशीष वचन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक मुनीम का भी मालिक के प्रति उपकार हुआ करता है, यदि कोई मुनीम दुकान को अच्छी तरह चलाता है, तो वह अपने मालिक के प्रति उपकार ही किया जाता है और यदि वह उसे दुकान को अच्छी तरह न चलाते तो घाटा लग जाता है। ऐसे ही एक सुयोग्य शिष्य का कर्तव्य है, जो मार्ग उन्हें दिया गया है, उस पर चलकर अपने कर्तव्य का पालन करें।
आचार्यश्री ने कहा यह कोई नया मार्ग नहीं है, पूर्व आचार्यों से जो मार्ग हमें  मिला, वह मोक्ष का मार्ग हमने आप लोगों केा दिया। उन्होंने कहा कि क्या भक्त का भी भगवान के ऊपर उपकार हो सकता है। हाँ...हाँ यह प्रवाह अनंतकाल से चला आ रहा है। भगवान के ऊपर भी शिष्य का उपकार तभी है, जब वह उस जैसा बन जाए एवं सदैव उनकी आज्ञा का पालन करता रहे। उन्होंने मनोबल को महत्वपूर्ण बताते हुए वाणी और विचारों का महत्व बताया। भगवान महावीर ने यह परंपरा किसी ओर से अनुसरण की एवं उसे आगे बढ़ाया एवं उसी परंपरा को हम आगे बढ़ा रहे हैं और यह अनवरत चलती रहेगी।
आचार्यश्री ने आकांक्षा रहित होने का उपदेश देते हुए कहा जैसे एक मृदंग तर्जनी एवं मध्यमा के माध्यम से उसको चोट की जाती है, तो ध्वनि का उत्पन्न करता है। वैसे ही धर्म उपदेश के माध्यम से गुरू अपने शिष्यों को, भक्तों को उपदेश देते हैं। उन उपदेशों के बदले वह आपसे कुछ नहीं चाहते मात्र उन आदर्शों को अपने जीवन में उतारकर आगे बढ़ेंगे तो आपका भी उद्धार होगा एवं अन्य जीवों पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने उपस्थित जन समुदाय को संबोधित करते हुए कहा सुख और दुख दोनों ही जीवन के अभिन्न अंगे हैं, जब भी दुख की घड़ी हो आप लोग महापुरुषों के जीवन चरित्र को पढ़ लिया करो। जिस प्रकार भगवान आपको उपदेश देते हैं, आपसे किसी भी प्रकार की आकांक्षा नहीं रखते उसी प्रकार आप लोग भी नि:स्वार्थ भाव से आत्महित के लिए पूजा किया करो।
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि रामटेक में 31 जुलाई को जिन 24 मुनि दीक्षा हुई, उनमें  से पांच मुनिराजों ने निश्वार्थ सागर, मुनिश्री र्निलोम सागर, मुनिश्री निश्प्रह सागर,  मुनिश्री निसीम सागर  एवं मुनिश्री निर्भीक सागर महाराजन ने भी संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन में गुरू के प्रति कृपा बताते हुए गुरू गणगान करते हुए उनके द्वारा किए गए उपकार को कभी न भुलाने की बात कही। उन्होंने कहा पापों का त्याग का नाम ही दीक्षा है एवं प्रतिदिन तीनों समय प्रतिक्रमण करते हुए अपने पापों का विसर्जित करते हैं एवं दीक्षा लेते हैं।
श्री जैन ने बताया कि इस अवसर पर विभिन्न नगरों से एवं मुनिराजों के ग्रहस्थ जीवन के माता-पिता, भाई-बहन एवं परिवार के लोग आए एवं विभिन्न नगरों से भक्तजन शामिल हुए।
neekesh suryawanshi